Thursday, 18 February 2016

लघु ज्योतिष एवं वास्तु संगोष्ठी दि. 15.2.16 (द्वारा "इंटरनेशनल सेंटर फॉर ज्योतिष, वास्तु, स्पिरिचुअल एंड कल्चरल एक्टिविटीज") देखें वास्तु टिप्स का उपयोगी वीडियो


संगोष्ठी में ज्योतिर्विद् महावीर कुमार सोनी के ज्योतिषीय उपायों के लेखों को लेकर प्रकाशित "ज्योतिष भारती" अंक का विमोचन भी किया गया
जयपुर। ज्योतिष वास्तु, एवं रेकी जेसी स्प्रिचुअल विद्याओं में शोध एवं अनुसन्धान को गति देने के क्रम में इंटरनेशनल सेंटर फॉर ज्योतिष, वास्तु स्प्रिचुअल एंड कल्चरल एक्टिविटीज ट्रस्ट (रजि.) द्वारा जयपुर में दिनांक 15.2.16 को फिर एक लघु संगोष्ठी का आयोजन किया गया, इसमें ज्योतिषी एवं वास्तुविद के रूप में आचार्य घनश्याम शर्मा, ज्योतिर्विद् महावीर सोनी, श्रीमती गायत्री वर्मा, श्रीमती मीनाक्षी शर्मा, श्रीमती बबीता राठी, श्रीमती संतोष चतुर्वेदी, डॉ. टीना जैन, श्रीमती संगीता माथुर, दिनेश कुमावत, संकेत राज भारद्वाज आदि द्वारा हिस्सा लिया गया। संगोष्ठी की अध्यक्षता ज्योतिर्विद्, हस्तरेखाविद् एवं वास्तुविद महावीर कुमार सोनी द्वारा की गई, संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने बताया कि आज की संगोष्ठी का मुख्य विषय धन एवं सुख शांति बढ़ाने के उपायों पर केंद्रित रखा जा रहा है, वास्तु दोष संबंधी किन कारणों से सुख शांति बाधित होती है, कड़ी मेहनत के बाद भी आशा अनुसार धन कम आता है या अपेक्षा अनुसार टिकता नहीं है, इस सम्बन्ध में बिना विशेष तोड़फोड़ या विशेष परिवर्तन के क्या क्या उपाय हैं, पर मुख्य रूप से आज चर्चा - परिचर्चा की जावेगी, सोनी ने कहा कि सभी विद्वानजनों से अनुरोध किया कि वे अपने ज्ञान व योग्यताओं के परिप्रेक्ष्य में अपने अनुभव लिए हुए सटीक उपाय ही यहाँ शेयर करें। सोनी ने आगे बोलते हुए बताया कि संगोष्ठी के अंत से पूर्व, अर्थात आपस में चर्चा परिचर्चा के बाद कोई भी दो वक्ताओं द्वारा आमजन को वास्तु टिप्स बताने हेतु दो वीडियो भी तैयार किए जावेंगे, जो यू- ट्यूब पर अपलोड किए जावेंगे। इसके बाद इस क्रम में सभी उपस्थित ज्योतिर्विदों एवं वास्तुविदों द्वारा ज्योतिष एवं वास्तु विषयों पर पर चर्चा परिचर्चा की गई, विशेष रूप से बिना तोड़फोड़ के वास्तु दोष संबंधी उपचारों पर जानकारियां शेयर की गई। गोष्ठी में नागरिक कल्याण परिषद के अध्यक्ष वीरेंद्र गोदिका एडवोकेट एवं गठजोड़ की संपादक श्रीमती सुरेखा सोनी ने भी हिस्सा लिया। इस अवसर पर ज्योतिर्विद् महावीर कुमार सोनी के ज्योतिषीय उपायों संबंधी नवीन शोध एवं अनुसंधानों के लेखों को लेकर प्रकाशित "ज्योतिष भारती" अंक का विमोचन भी किया गया। इस अंक में सफलता हेतु अपना नाम कैसे अक्षरों को लेकर लिखा जावे, बालक बालिका के भावी जीवन में सफलता हेतु नामकरण की सही विधि क्या है, ग्रह शांति के उपायों में रत्न धारण में क्या क्या सावधानियां आवश्यक है, सहित विभिन्न लेख हैं। संगोष्ठी के अंत से पूर्व वीडियो जारी करने हेतु वक्ताओं के रूप में प्रख्यात ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद आचार्य घनश्याम शर्मा एवं श्रीमती मीनाक्षी शर्मा को चुना जाकर इनके द्वारा धन एवं सुखशांति बढ़ाने हेतु अपने टिप्स आमजन हेतु बताए गए, जिस पर आधारित वीडियो निम्न लिंक पर जाकर देखे जा सकते हैं -
Part 1
https://www.youtube.com/watch?v=KH-kXi3GZ1Y
Part 2
https://www.youtube.com/watch?v=cj8X7irG42c



Wednesday, 27 January 2016

ज्योतिष एवं वास्तु विषयों पर नि:शुल्क वर्कशॉप

जयपुर। इंटरनेशनल सेंटर फॉर ज्योतिष, वास्तु, स्पिरिचुअल एन्ड कल्चरल एक्टिविटीज ट्रस्ट की ओर से ज्योतिष एवं वास्तु विषयों पर एक लघु वर्कशॉप रविवार, दिनांक 31 जनवरी को प्रात: 10 से सांय 5 बजे तक जयपुर (राजस्थान) में आयोजित होने जा रही है। जो भी  इस वर्कशॉप में आकर इन विषयों पर समाधान चाहते हैं, जानकारी अर्जित करना चाहते हैं, वे मोबाइल पर फोन कर अपना रजिस्ट्रेशन करा लें।
वर्कशॉप पूर्णत: नि:शुल्क आयोजित हो रही है, वर्कशॉप किसान मार्ग, टोंक फाटक पर होगी, वर्कशॉप हेतु स्थान सीमित हैं, जो पूर्व में फोन द्वारा रजिस्ट्रेशन करावेंगे, वो ही इसमें हिस्सा ले सकेंगे।
डॉ. टीना जैन, कार्यक्रम संयोजक
मो. 07822061620
     09782560245

Wednesday, 9 September 2015

Manglik Dosh in Kundali Hindi

वर या वधू  की जन्म कुंडली में 1,4,7,8 एवं 12 भाव में मंगल हो तो मांगलिक दोष होता है जो एक दूसरे के जीवन के लिए अरिष्ट कारी होता है। इन भावो में शनि होने से भी मंगल जैसा दोष माना जाता है। वर की कुंडली में मांगलिक योग कन्या के लिए और कन्या की कुंडली में मांगलिक योग होने पर वर के लिए अनिष्ट कारक माना  जाता है।  यदि दोनों की कुण्डलियाँ मांगलिक हो तो विवाह में कोई दोष नहीं माना जाता है। इन स्थितियों में मंगल दोष शांत हो जाता है :-
1. मांगलिक दोष से भिन्न दूसरी कुंडली के 1,4,7,8 एवं 12 भाव में शनि हो तो मंगल दोष शांत हो जाता है।
2. बली गुरु या शुक्र लग्न या 7 भाव में हो तो मंगल  दोष नहीं माना जाता है।
3. मेष  राशि का मंगल लग्न  भाव में हो या चौथे भाव में वृश्चिक का मंगल हो या सातवे स्थान में  मकर का मंगल  हो या आठवे स्थान में कर्क का मंगल हो या बारहवें  स्थान में यानि बारहवें  भाव में धनु राशि   का मंगल हो तो मंगल दोष नहीं माना जाता है ।
4. यदि वधु की  कुंडली में जहाँ मंगल हो उसी स्थान यानी भाव में वर की कुंडली में कोई प्रबल पाप ग्रह हो  तो मंगल दोष नहीं रहता है।
5. जन्म कुंडली के दूसरे  भाव में चन्द्र शुक्र हो या मंगल गुरु की युति हो या गुरु पूर्ण दृष्टि  से मंगल को देखता हो या केंद्र भाव में राहु अथवा मंगल राहु की युति हो तो मंगल दोष नही रहता है।

6. जन्म कुंडली के केंद्र त्रिकोण में शुभ-ग्रह एवं कुंडली के 3,6,8,11 वें भाव में पाप-ग्रह हो तो मंगल दोष शांत हो जाता है। 
7. केंद्र में चन्द्र या चन्द्र मंगल की युति हो तो भी मंगल दोष नहीं रहता है। 
8. वक्री, नीच, अस्त अथवा शत्रु राशि स्थित मंगल 1,4,7,8 एवं 12 वें भाव में हो तो मंगल दोष नहीं रहता है।
9. कहीं कहीं ऐसा भी मत है कि वर वधु गुण मिलान में तीस से अधिक गुण मिलते हो, राशि मैत्री हो तो भी मंगल दोष विचार नहीं करना चाहिए। 

 विशेष स्थितियों में चन्द्र कुंडली से भी मंगल योग का विचार करना चहिये।   

Tuesday, 25 August 2015

ग्रह शान्ति या ग्रहों के शुभ प्रभाव बढ़ाने हेतु रत्नों के उपयोग में क्या रखनी चाहिए सावधानियां



ग्रहों के अरिष्ट निवारण या ग्रहों के शुभ प्रभाव बढ़ाने हेतु रत्नों के धारण का प्रचलन प्राचीन काल से होता आ रहा है।  भारतीय ज्योतिष प्रणाली में इसको प्राय:कर  प्रत्येक ज्योतिषी अपने मार्गदर्शन में बहुतायत से इनका उपयोग बताया करते हैं।  किन्तु रत्नों के उपयोग में बहुत अधिक सावधानी की आवश्यकता है। रत्न का उपयोग जहाँ एक और बहुत अधिक लाभकारी है वहीँ बिना सावधानी बिना जन्म कुंडली के गहन चिंतन के अभाव में खतरनाक भी सिद्ध हो सकता है।  मात्र नाम राशि देखी और रत्न धारण कर लिया, किसी ने बता दिया भाग्येश गुरु है कमजोर अवस्था में है इसलिए भाग्य उदय नहीं हो  रहा है,  भाग्य की बढ़ोतरी हेतु पुखराज धारण कर लें या लग्नेश शुक्र कमजोर है, शत्रु राशि पर है या इस  कारण से कमजोर है, आप तुरंत डायमंड पहन लें, इसका उपरत्न जरकन ही पहन लें,  यह उचित नहीं है। रत्नों का वास्तव में प्रभाव होता है इनमे सम्बंधित ग्रहों की रश्मियाँ समाहित रहती है  अतः ये निश्चित ही प्रभाव बढ़ाने में कारगर है किन्तु ये सम्बंधित भाव का शुभ ही प्रभाव बढ़ाएंगे यह निश्चित नहीं है। इसके लिए एक तो रत्न का दोष रहित होना आवश्यक है, अर्थात रत्न चाहे बिलकुल असली हो या असली रत्न के उप रत्न हों, वे साफ होने चाहिए।  यह देख लेना चाहिए कि रत्न - उपरत्न में कोई चीर आदि तो दिखाई नहीं दे रही है, वो  किसी प्रकार से खंडित तो  नहीं है,  साथ ही छींटे रहित भी है या  नहीं आदि बातों की पूरी तरह जांच कर लेनी चाहिए या किसी रत्न विशेषज्ञ  को दिखाकर पूछ लेना चाहिए ।  यह तो रत्न धारण  करने के बारे में एक पक्ष हुआ इससे भी शक्तिशाली जो पक्ष है उसके अनुसार आप रत्न द्वारा अपनी जन्मकुंडली के कौनसे भाव के शुभ प्रभाव को बढ़ाने चाहते हैं, जिस भाव के शुभ प्रभाव को आप  बढ़ाना चाहते हैं उस भाव से संबंधित दूसरी राशि किस भाव का प्रतिनिधित्व कर रही है, यह देखकर रत्न धारण करना पहले बताई सावधानी से भी अधिक सावधानी बरतने योग्य बात है।  भारतीय ज्योतिष विज्ञान के अनुसार  नौ ग्रहों में सूर्य चन्द्र को छोड़कर हर एक ग्रह को दो राशियों का स्वामी माना गया है अर्थात सूर्य चन्द्र के अलावा हर ग्रह जन्मकुंडली के दो भावों से सम्बंधित है यानी उनका स्वामी है। यदि कुंडली के किसी भाव के प्रभाव को बढ़ाना है तो उस भाव में जो राशि है उसके स्वामी से सम्बंधित ग्रह के अनुसार रत्न धारण करवाया जाता है।  यह उस स्थिति  में तो सही कहा जा सकता है जब वह ग्रह कुंडली के ऐसे दूसरे भाव का भी स्वामी हो जो की शुभ ही समझा जाता हो, जैसे कोई ग्रह केंद्र त्रिकोण दोनों ही शुभ भावों का स्वामी हो। इसे उदाहरण द्वारा भी समझें  जैसे मेष लग्न है जिसका स्वामी मंगल ग्रह है, इस  भाव का स्वामी मंगल शत्रु राशि पर या कुंडली में ऐसी पोजीशन में जिसके कारण हम इसे कमजोर समझ रहे हैं, जिसके लिए रत्न के रूप में मूंगा धारण एक उपचार है। निश्चित ही अच्छा मूंगा मंगल ग्रह को मजबूती दे सकता है किन्तु यहाँ प्रथम भाव (लग्न) के साथ मंगल के स्वामित्व से संबंधित दूसरी राशि राशि वृश्चिक जो कुंडली के आठवें भाव में है के प्रभाव में भी इससे बढ़ोत्तरी होगी, परिणामतः मंगल की दशा अन्तर्दशा में भी शुभ एवं अशुभ दोनों तरह के फल प्राप्त होंगे। अतः मेरी दृष्टि में  उक्त  स्थिति  में मूंगा धारण करना उचित नहीं है। वहीँ यदि मंगल ऐसे दो भावों का स्वामी हो, जो दोनों ही भाव  शुभ समझे जाते हों, जैसे लग्न कर्क हो तब मंगल केंद्र त्रिकोण (पंचम एवं नवम ) दोनों शुभ भावों का स्वामी होगा, मूंगा धारण करने से दोनों ही शुभ भावों के प्रभाव में बढ़ोतरी होगी जो कि  किसी भी दृष्टि से अनुचित नहीं है।  अतःकिसी भी भाव के शुभ प्रभाव को बढ़ाने या उसके स्वामी  ग्रह के शुभ प्रभाव को बढ़ाने में इस एक पक्ष को सबसे अधिक ध्यान में रखा जाकर रत्न धारण किया जाना चाहिए अन्यथा लाभ की जगह हानि भी संभावित है ।   

Saturday, 22 August 2015

णमोकार मंत्र और राशिचक्र

💥आकाश में संस्थित भचक्र तीन सौ साठ अंशों का धारक है। वह भचक्र बारह राशियों में विभक्त होने के कारण प्रत्येक राशि तीस अंश की होती है। दूसरी अपेक्षा से विचार करें तो भचक्र के एक सौ साठ भाग होते हैं। उनके बारह विभाग होने से नौ भाग की एक राशि होती है। राशियों का ग्रह और नक्षत्र के साथ अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है। राशियों का जैसा स्वरूप होता है, उन राशियों में उत्पन्न हुए स्त्री-पुरुषों का स्वरूप प्राय: वैसा ही होता है। जन्मकुण्डली से फ़ल जानने के लिये ग्रह और राशियों का समन्वय करना अनिवार्य होता है। किस राशि वाले जातक को णमोकारमन्त्र के कौनसे पद का जप करना चाहिये?
इसे स्पष्ट करते हुए आचार्यश्री मानतुंग जी महाराज ने लिखा है-
जमु कण्णा-विस अरिहा, मसो मयरो य अंतिणो सिद्धा। पंचाणण अलि सूरी, धणु मिहुणोज्झावया वंदे॥
(णवकारसारथवणं = 27)
अर्थ :- अरिहन्त-परमेष्ठी कुम्भ, कन्या और वृषराशि के स्वामी हैं। सिद्ध-परमेष्ठी मेष, मकर और मीन राशि के स्वामी हैं।
आचार्य-परमेष्ठी सिंह तथा वृश्‍चिक राशि के स्वामी हैं।
उपाध्याय-परमेष्ठी धनु और मिथुन राशि के स्वामी हैं। उन्हें मेरा नमस्कार हो।
कक्कडतुला य साहू, दोहद रासी य पंचपरमेट्ठी।
भावेणं थुणमाणो, पावइ सुक्खं च मुक्खं च॥
(णवकारसारथवणं = 28)
अर्थ:- साधु-परमेष्ठी कर्क और तुला राशि के स्वामी हैं। इस प्रकार बारह राशि स्वरूप परमेष्ठी की जो भावपूर्वक स्तुति करता है, वह सौख्य तथा मोक्ष को प्राप्त करता है।
🚫मेषराशि = क्षत्रियवर्ण वाली मेषराशि चरसंज्ञक है। पूर्व दिशा के स्वामी के रूप में स्वीकृत इस राशि को पुल्लिंगी माना गया है। इसकी प्रकृति उग्र है। लाल और पीले रंग को धारण करने वाली इस राशि का स्वामी मंगलग्रह है। इस राशि में अग्नितत्व की प्रधानता मानी गयी है। अग्नितत्व के कारण यह राशि पित्तप्रकृति का वर्द्धन करती है। इस राशि का प्राकृतिक स्वभाव साहसी, अभिमानी और मित्रों पर कृपा करने वाला है। इस राशि को रात्रिबली माना गया है। यह पृष्ठोदयी है। साहसी स्वभाव की वृद्धि के लिये, रजोगुण को कम करने के लिये तथा अभिमान की हानि के लिये इस राशि वाले भव्यों को णमो सिद्धाणं का ध्यान और जप करना चाहिये।
🚫 वृषभराशि = स्त्रीलिंग को धारण करने वाली वृषभ राशि स्थिरसंज्ञक है। इसे दक्षिणदिशा की स्वामिनी के रूप में स्वीकार किया गया है। यह वातप्रकृति प्रधान, शीतल स्वभावी, श्‍वतेवर्ण वाली है। शुक्रग्रह इस राशि का स्वामी है। यह रात्रिबली है। इसे वैश्यवर्ण वाली माना गया है। इस राशि में पृथ्वीतत्व की प्रधानता पायी जाती है। यह पृष्ठोदयी राशि है। इसका प्राकृतिक स्वभाव स्वार्थी है। कण्ठ, मुख और कपोल के रोगों का विनाश करने के लिये, स्वार्थी स्वभाव को कम करने के लिये, समझ-बूझ को बढ़ाने के लिये रजोगुण को कम करने के लिये तथा इष्ट कार्यों में दक्षता को प्राप्त करने के लिये इस राशि वाले भव्य जीवों को णमो अरिहंताणं इस पद का जप और ध्यान करना चाहिये।
🚫 मिथुनराशि = शूद्रवर्ण को धारण करने वाली मिथुन राशि द्विस्वभावी है। इस राशि में वायुतत्व प्रधान होता है। तोते के समान हरित वर्ण वाली यह राशि दिवाबली मानी गयी हैं। यह पश्‍चिम दिशा की स्वामिनी है। इसे पुरुष राशि माना गया है। यह राशि विषमोदयी और उष्ण है। इस राशि के द्वारा कन्धों और बाहुओं का विचार किया जाता है। यह शीर्षोदयी राशि है। इस राशि का स्वामी शुक्र ग्रह है। कन्धे आदि के रोगों का विनाश करने के लिये, शरीर को पुष्ट करने के लिये, अध्ययन में आने वाले विघ्नों का विनाश करने के लिये तथा कलाओं में पारंगतता को प्राप्त करने के लिये इस राशि वाले भव्य जीवों को णमो उवज्झायाणं इस पद का जप तथा ध्यान करना चाहिये।
🚫 कर्कराशि = कर्कराशि चरसंज्ञक और स्त्रीजातीय है। इसकी सौम्यप्रकृति है। इस प्रकृति में कङ्ग की प्रधानता होती है। यह रात्रिबली राशि उत्तर दिशा की स्वामिनी हैं। यह राशि लालवर्ण और श्‍वेतवर्ण से मिश्रित पिंगल वर्ण वाली है। यह समोदयी राशि जलचारी है। ज्योतिर्विदों ने इसे विप्रवर्णीय माना है। यह राशि पृष्ठोदयी है। इसका स्वामी चन्द्र ग्रह है। पेट-वक्ष:स्थल और गुर्दे के रोगों का विनाश करने के लिये, कार्य में स्थैर्यत्व को प्राप्त करने के लिये, सांसारिक क्षेत्र में उन्नति के दर्शन करने के लिये, सत्वगुण की वृद्धि करने के लिये तथा लज्जा आदि सद्गुणों की वृद्धि करने के लिये इस राशि वाले भव्य जीवों को णमो लोए सव्व साहूणं इस पद का जप तथा ध्यान करना चाहिये।
🚫सिंहराशि = सिहंराशि का स्वामी सूर्य ग्रह है। यह पुरुष जाति की राशि है। स्थिरसंज्ञक इस राशि में अग्नितत्व है। यह राशि दिन में बली है, पित्तप्रकृति की धारिका है और पूर्व दिशा की स्वामिनी है। यह निर्जल राशि क्षत्रिय वर्ण वाली है। इसका प्राकृतिक स्वरूप मेष जैसा है, फिर भी इसमें स्वातन्त्र्य प्रेम और उदारता ये दो गुण विशेष रूप से पाये जाते हैं। यह शीर्षोदयी राशि है। इसका वर्ण गुलाबी है। हृदयरोगों का विनाश करने के लिये, सत्त्वगुण की वृद्धि करने के लिये, शरीर को पुष्ट करने के लिये तथा शारिरिक उष्णता को कम करने के लिये इस रााशि वाले भव्य जीवों को णमो आइरियाणं इस पद का जप तथा ध्यान करना चाहिये।
🚫कन्याराशि = पिंगल वर्ण वाली कन्या राशि स्त्रीजातीय है। इसका स्वामी बुध ग्रह है। इसमें सौम्य और कङ्गप्रकृति पायी जाती है। दक्षिण दिशा की स्वामिनी इस राशि को रात्रिकाल में बली माना गया है। इस राशि में पृथ्वीत्तव की बहुलता पायी जाती है। इसमें मिथुनराशि के समान स्वभाव पाया जाता है। विशेषता यह है कि इस राशि वाला जातक आत्मोन्नति तथा सम्मान का ध्यान रखने में प्रयत्नशील रहता है। यह राशि शीर्षोदयी है। इसके स्वभाव में अपने नाम के अनुसार बालिका के कोमलता आदि गुण पाये जाते हैं। इसका वैश्यवर्ण है। उदरसम्बन्धित रोगों का विनाश करने के लिये, सद्गुणों की वुद्धि करने के लिये तथा आत्मसम्मान की प्राप्ति करने के लिये इस राशि वाले भव्य जीवों को णमो अरिहंताणं इस पद का जप तथा ध्यान करना चाहिये।
🚫 तुलाराशि = पुरुषजातीय, चरसंज्ञक तुलाराशि पश्‍चिम दिशा की स्वामिनी है। श्यामल वर्ण वाली यह राशि शीर्षोदयी है। यह शुद्रसंज्ञक राशि दिवाबली है। इसका स्वभाव कू्रर है। काले रंग की इस राशि में रजोगुण और जलतत्त्व की प्रधानता पायी जाती है। इस भूचर राशि का स्वामी शुक्र ग्रह है। नाभि के नीचे के अंगों को परिपुष्ट बनाने के लिये, रजोगुण को कम करने के लिये, स्वभाव में विचारशीलता, ज्ञानप्रियता और कार्यसम्पादकता की वृद्धि करने के लिये, इस राशि वालेे भव्य जीवों को णमो लोए सव्व साहूणं इस पद का जप तथा ध्यान करना चाहिये।
🚫वृश्‍चिकराशि = वृश्‍चिक स्थिरसंज्ञक और शुभ्रवर्णीय राशि है। इसमें जलतत्त्व की प्रधनता है। उत्तर दिशा की स्वामिनी यह राशि रात्रिबली है कफ प्रकृति वाली इस राशि में तीक्ष्ण स्वभाव पाया जाता है। इस राशि का स्वामी मंगल ग्रह है तो इसका वर्ण ब्राह्मण है। इस राशि का प्राकृतिक स्वभाव दम्भी, हठी, दृढ़प्रतिज्ञा, स्पष्टवादी और निर्मल है। शरीर की उँचाई को बढ़ाने के लिये, जननेन्द्रियों से सम्बन्धित रोगों का समूल विनाश करने के लिये तथा स्वाभाविक तीक्ष्णता को कम करने के लिये इस राशि वाले भव्य जीवों को णमो आइरियाणं इस पद का जप तथा ध्यान करना चाहिये।
🚫धनुरााशि = पुरुषजातीय धनुराशि का रंग सुवर्ण के समान पीला है। यह द्विस्वभावी कू्ररसंज्ञक राशि पूर्व दिशा की स्वामिनी है। इसमें पित्तप्रकृति की बहुलता पायी जाती है। अग्नितत्व से संयुक्त इस राशि का क्षत्रिय वर्ण है। यह अर्द्धजल राशि दिवाबली है। गुरु ग्रह इस राशि का स्वामी है। इसका प्राकृतिक स्वभाव अधिकारप्रिय, करुणामय और मर्यादा का इच्छुक है। यह राशि पृष्ठोदयी है और सत्त्वगुण से सम्पन्न है। पैरों की सन्धियों से सम्बन्धित रोग अथवा जंघाओं के रोगो को विनष्ट करने के लिये, तेजस्विता की वृद्धि करने के लिये तथा करुणा आदि सत्त्वगुणों की वृद्धि करने के लिये इस राशि वाले भव्य जीवों को णमो उवज्झायाणं इस पद का जप तथा ध्यान करना चाहिये।
🚫मकरराशि = मकरराशि चरसंज्ञक है। पृथ्वीतत्त्व की प्रधानता वाली इस राशि में वातप्रकृति पायी जाती है। यह रात्रिबली राशि दक्षिण दिशा की स्वामिनी है। पिंगल वर्ण वाली इस राशि का प्राकृतिक स्वभाव उच्चदशाभिलाषिता है। इस राशि का वर्ण वैश्य है। इस राशि का स्वामी शनि ग्रह होने से इसमें तमोगुण की प्रधानता पायी जाती है। यह पृष्ठोदयी राशि है। तमोगुण का पूर्णरूप से विनाश करने के लिये, घुटनों की पीड़ा का शमन करने के लिये, उच्च पदों की प्राप्ति के लिये, वैराग्यभावों की अभिवृद्धि करने के लिये तथा स्वाभाविक नम्रता का विकास करने के लिये इस राशि वाले भव्य जीवों को णमो उवज्झायाणं इस पद का जप तथा ध्यान करना चाहिये।
🚫कुम्भराशि = पुरुष जातीय कुम्भराशि स्थिरसंज्ञक है। इसमें प्रधानरूप से वायुतत्त्व पाया जाता है। कबरैले रंग वाली इस राशि का वर्ण शूद्र है। यह शीर्षोदयी राशि दिवाबली है। यह राशि पश्‍चिम दिशा की स्वामिनी है। इस राशि का स्वामी शनि ग्रह है। तमोगुणप्रधान इस राशि का प्राकृतिक स्वभाव विचारशील और नवीन बातों का आविष्कारक है। इस राशि वाला जातक धर्मधारक होता है। तमोगुण का विनाश करने के लिये, धर्मनिष्ठता को बढ़ाने के लिये, चित्त में शान्ति की स्थापना करने के लिये, स्वाभाविक स्थिरता की स्थापना करने के लिये तथा उदरवर्ती रोगों का विनाश करने के लिये तथा इस रााशि वाले भव्य जीवों को णमो अरिहंताणं इस पद का जप तथा ध्यान करना चाहिये।
🚫मीनरााशि = मीनराशि द्विस्वभावी है। स्त्रीजातीय इस राशि में कफप्रकृति की प्रधानता है। जलतत्व से संयुक्त इस राशि में रात्रिबलीपना पाया जाता है। विप्रवर्णीय इस राशि वाले जातक का रंग पिंगल होता है। यह राशि उत्तर दिशा की स्वामिनी इस राशि का स्वामी गुरु ग्रह है। इस राशि का प्राकृतिक स्वभाव उत्तम, दयालु और दानशील है। इस रााशि में सत्त्वगुण पाया जाता है। यह उभयोदयी है। पैरों से सम्बन्धित रोगों का विनाश करने के लिये, उदारता आदि सत्त्वगुणों की वृद्धि करने के लिये तथा उत्तम स्वभाव की प्राप्ति के लिये इस राशि वाले भव्य जीवों को णमो सिद्धाणं इस पद का जप तथा ध्यान करना चाहिये।
मार्गदर्शक.चतुर्थ पट्टाधीश आचार्य सुविधिसागरजी महाराज